नया भारत: एक सभ्यता का पुनर्जागरण (भाग - 1)
(परंपरा, प्रगति और व्यवस्था की 'घुन' को मिटाने का मास्टर ब्लूप्रिंट)
खंड 1: 'घुन' की पहचान - बीमारी का सही समय पर इलाज
1. पल्लू और पहिए का सटीक उदाहरण: हमारे समाज में एक बहुत सामान्य लेकिन गहरी बात कही जाती है—जब कोई महिला बाइक पर बैठती है, तो हर कोई उसे टोकता है कि "बहन, अपना पल्लू संभाल लो, कहीं पहिए में न फंस जाए।" यह क्या है? यह दुर्घटना होने से पहले खतरे को भांपकर उसे रोकने की एक समझ है। लेकिन दुर्भाग्य से, जब बात हमारे देश की प्रशासनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय संपदा की आती है, तो हम यह 'पल्लू' पहिए में फंसने देते हैं। हम तब तक इंतज़ार करते हैं जब तक दुर्घटना न हो जाए। एक राष्ट्र के रूप में हमें यह सीखना होगा कि खतरे, लापरवाही और 'घुन' (दीमक) को समय रहते पहचान कर उसका इलाज करना ही विकास की पहली शर्त है। बिना इस पहचान के, कोई भी विकास टिक नहीं सकता।
2. खरपतवार और किसान की समझ: एक सच्चा किसान जानता है कि अगर फसल में खरपतवार (Weeds) उग आए हैं, तो उसे शुरुआती दौर में ही उखाड़ फेंकना चाहिए। यदि किसान यह सोचे कि "कोई बात नहीं, मेरी फसल बहुत मजबूत है, वह इसे झेल लेगी," तो अंत में उस खरपतवार के कारण उसे भारी नुकसान उठाना पड़ता है। ठीक यही स्थिति हमारे देश के हर सेक्टर की है। चाहे वह स्वास्थ्य हो, शिक्षा हो, या सड़क निर्माण—अगर हमने व्यवस्था में पनप रही लापरवाही, भ्रष्टाचार और अक्षमता रूपी 'खरपतवार' और 'घुन' का सही समय पर मैनेजमेंट नहीं किया, तो पूरी व्यवस्था रूपी फसल बर्बाद हो जाएगी। बीमारी छोटी हो तभी उसका इलाज करना राष्ट्रहित है, अन्यथा वह नासूर बन जाती है।
3. विभागों की गैर-जिम्मेदारी (एक का काम, दूसरे का नुकसान): आज हमारी व्यवस्था का सबसे कड़वा सच यह है कि एक सरकारी विभाग अपना काम करता है और उसी प्रक्रिया में वह दूसरे विभाग का या जनता का भारी नुकसान कर देता है, और उसकी कोई जिम्मेदारी (Accountability) तय नहीं होती। उदाहरण के लिए, पीडब्ल्यूडी (PWD) सड़क बनाता है, और कुछ दिन बाद ही सीवरेज या टेलीफोन केबल वाले बिना किसी तालमेल (Communication) के उस नई सड़क को खोद डालते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में केवल एक ही चीज़ का नुकसान होता है—जनता के पैसे और राष्ट्र की संपत्ति का। अव्यवस्था की इस 'घुन' को हमें पहचानना होगा और इस पर लगाम कसनी होगी।
4. कुर्सी का 'श्रमदान' (एक व्यावहारिक प्रयोग): इस व्यवस्था की मानसिकता को सुधारने के लिए बड़े अधिकारियों (Head of State / Nation) की बैठकों में एक व्यावहारिक (Practical) प्रयोग किया जाना चाहिए। मीटिंग शुरू होने से पहले, कमरे की सारी कुर्सियां इधर-उधर बिखेर दी जाएं। जब अधिकारी आएं, तो उन्हें वे कुर्सियां खुद ठीक करने को कहा जाए। जब वे सब ठीक कर लें, तब उन्हें यह समझाया जाए कि—"देखिए, कुर्सियां भी वही थीं, पैसा भी वही था और कमरे का आकार भी वही था। बस आपने थोड़ा सा 'श्रमदान' किया और सब व्यवस्थित हो गया।" ठीक इसी तरह, देश में पैसे या संसाधनों की कमी नहीं है, बस विभागों के बीच सही तालमेल, नीयत और व्यवस्था को सही तरीके से सजाने की कमी है।
खंड 2: जनता के पैसे की बर्बादी और 'फर्जी' कार्य संस्कृति
5. पैसा है, पर डिलीवरी (Delivery) शून्य है: अक्सर यह रोना रोया जाता है कि विकास के लिए पैसा नहीं है। यह सबसे बड़ा झूठ है। पैसा है, और पैसा बड़ी मात्रा में आवंटित भी होता है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह पैसा 'बर्बाद' ज्यादा होता है और 'खर्च' कम। योजनाएं कागजों पर पूरी हो जाती हैं, लेकिन ज़मीन पर 'डिलीवरी' नहीं होती। टैक्सपेयर (करदाता) के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा अव्यवस्था, लीकेज और विभागों की आपसी खींचतान की भेंट चढ़ जाता है। जब तक 100 रुपये में से पूरे 100 रुपये ज़मीन पर नहीं दिखेंगे, तब तक यह पैसा बर्बाद ही माना जाएगा।
6. तालमेल का अभाव (सिरसा हाईवे का कड़वा उदाहरण): सरकारी विभागों में कम्युनिकेशन (संवाद) की कमी का सबसे ज्वलंत और पीड़ादायक उदाहरण हमारे शहरों की सड़कों पर रोज़ देखने को मिलता है। जैसे सिरसा के सिकंदरपुर हाईवे से परशुराम चौक तक पहले शानदार इंटरलॉकिंग (Interlocking) टाइलें लगाई जाती हैं, और उसके ठीक बाद पाइपलाइन बिछाने के लिए उस पूरी नई सड़क को बेरहमी से खोद दिया जाता है। सारे विभागों में पढ़े-लिखे इंजीनियर बैठे हैं, फिर भी ऐसा हाल क्यों है? क्योंकि उनके बीच कोई तालमेल नहीं है। वे आगे-पीछे काम करके केवल पब्लिक को परेशान करते हैं, लेबर (श्रम) का नुकसान करते हैं और देश के बहुमूल्य इंफ्रास्ट्रक्चर को बर्बाद करते हैं।
7. कागजी काम बनाम जमीनी हकीकत (बिजली बोर्ड की लापरवाही): बिजली बोर्ड (Electricity Board) जैसे कई विभागों में सारा काम केवल कागजों पर 'परफेक्ट' चलता है। वास्तविकता में, सेफ्टी (Safety) और सुरक्षा मानकों की भारी कमी है। यदि बिजली सप्लाई में अवांछित उतार-चढ़ाव (Voltage fluctuation), डबल फेस या न्यूट्रल ब्रेक होने के कारण किसी आम उपभोक्ता के घर के महंगे उपकरण (फ्रिज, टीवी आदि) जल जाते हैं, तो बिजली बोर्ड कभी उस नुकसान की भरपाई नहीं करता। उपभोक्ता सालों-साल शिकायत करता रहता है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती। यदि सरकार या विभाग की गलती से जनता का नुकसान होता है, तो उसका मुआवजा (Pay) उपभोक्ता को अनिवार्य रूप से मिलना ही चाहिए।
8. बिना टेस्टिंग के योजनाएं थोपना (डिजिटल परेशानियां): डिजिटलाइजेशन (Digitalization) और यूपीआई (UPI) बहुत मजबूत हथियार हैं, लेकिन जब सरकारी विभाग बिना पूरी राष्ट्रीय टेस्टिंग (Testing) के कोई नई ऐप या सेवा जनता पर थोप देते हैं, तो उससे दुनिया भर की परेशानियां खड़ी होती हैं। जैसे नेशनल कॉमन मोबिलिटी कार्ड (NFC Prepaid Card) सालों तक काम ही नहीं करता और शिकायतों का कोई नतीजा नहीं निकलता। कोई भी डिजिटल सेवा लॉन्च करने से पहले उसे यूज़र्स से बड़े पैमाने पर टेस्ट करवाना चाहिए (Beta Testing)। प्राइवेट कंपनियों की ऐप्स बहुत तेज़ और स्थिर (Steady) होती हैं, लेकिन सरकारी सेवाओं में आज भी वही ढुलमुल रवैया और लूपहोल (Loophole) छोड़े जाते हैं, ताकि 'कैश फ्लो' बना रहे और भ्रष्टाचार की गुंजाइश खत्म न हो।
9. स्कूलों के बाहर की गंदगी और नगर निगम का 'प्रोफेशनल' होना: नगर पालिका या नगर निगम का काम केवल झाड़ू लगाना नहीं है। उनका काम तब 'प्रोफेशनल' (Professional) माना जाएगा जब सड़क पर चलते हुए सीवर के ढक्कन का पता ही न चले (Perfect Leveling)। आज स्कूलों के बाहर गंदगी के ढेर लगे हैं, और उसी के दायरे में शराब और मीट की दुकानें खुली हैं। इन चीज़ों का मासूम बच्चों की मानसिकता पर क्या प्रभाव पड़ेगा? एक हरे-भरे, स्वच्छ और अनुशासित माहौल के बजाय हम उन्हें कचरा और शराब दिखा रहे हैं। डिवाइडर ग्रीन, वेल्ड-पेंटेड और सुरक्षित होने चाहिए। सड़क को महीनों तक जाम करके 'तुक्केबाजी' से लीकेज ढूंढने की अनपढ़ प्रथा को बंद करके एडवांस टेक्नोलॉजी (Advance Technology) का उपयोग होना चाहिए।
10. शिक्षा और स्वास्थ्य में प्राइवेट बनाम सरकारी का अंतर: सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की सैलरी प्राइवेट स्कूलों की तुलना में 5 से 6 गुना अधिक होती है, फिर भी उनके परिणाम कभी प्राइवेट स्कूलों जैसे क्यों नहीं आते? क्योंकि सरकारी पैसे का सही आउटपुट (Output) नहीं लिया जा रहा है। प्राइवेट सेक्टर कम पैसे में ज्यादा आउटपुट देता है। यही हाल स्वास्थ्य विभाग और फायर सेफ्टी (Fire Department) का है, जहाँ लिफ्ट के इंस्पेक्शन और फायर सेफ्टी के सर्टिफिकेट सिर्फ 'फर्जी' तरीके से कागजों पर बंट रहे हैं। व्यावहारिक (Practical) चेकिंग कहीं नहीं है, जो भविष्य में बड़े हादसों (जैसे आग लगना, बिल्डिंग गिरना) का कारण बनती है।
(भाग - 2)
(खाद्य सुरक्षा, भूमि-मुक्ति और राष्ट्र-द्रोहियों के नाश का मास्टर ब्लूप्रिंट)
खंड 3: हमारे भोजन में घुलता ज़हर और 'फर्जी' कार्य-संस्कृति
11. खाद्य सुरक्षा (FSSAI) का खोखलापन और 'फर्जी' सर्टिफिकेट: आज हमारे देश के फूड और होटल इंडस्ट्री की हकीकत बेहद डरावनी है। बड़े-बड़े होटलों, रेहड़ी-पटरियों और ढाबों पर FSSAI (भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण) के सर्टिफिकेट शान से टंगे होते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर वे पूरी तरह से 'फर्जी' और कागजी साबित होते हैं। ये होटल और फूड चेन्स रोज़ाना लाखों-करोड़ों रुपये की कमाई कर रहे हैं, लेकिन जब बात साफ-सफाई (Hygiene) और जनता के स्वास्थ्य की आती है, तो वहाँ भयानक गंदगी का अंबार मिलता है। सरकारी विभागों का काम केवल कागजों पर सर्टिफिकेट बांटने और फीस वसूलने तक सिमट कर रह गया है। व्यावहारिक निरीक्षण (Practical Inspection) और कड़ी कार्रवाई का पूरी तरह से अभाव है। जब तक खाद्य सुरक्षा विभाग ज़मीन पर उतरकर अचानक और सख्त छपेमारी नहीं करेगा, तब तक जनता के स्वास्थ्य के साथ यह खिलवाड़ बदस्तूर जारी रहेगा।
12. खाने के नाम पर बिकता ज़हर और युवा पीढ़ी का बर्बाद स्वास्थ्य: आजकल बाजार में बिकने वाले जूस, कोल्ड ड्रिंक्स, फ्रूट ड्रिंक्स, स्नैक्स और डिब्बाबंद जंक फूड की फैक्ट्रियां खाने के नाम पर सीधा ज़हर बेच रही हैं। इन मुनाफाखोरों को केवल अपने पैसों से मतलब है; पब्लिक हेल्थ, हाइजीन और सुरक्षा से इनका कोई लेना-देना नहीं है। हमारे बच्चों की पूरी पीढ़ी कृत्रिम रंगों, केमिकल युक्त स्नैक्स और 'कुरकुरे' खाकर बड़ी हो रही है। जरा सोचिए, जिस देश की युवा पीढ़ी और बच्चों का स्वास्थ्य इन जंक फूड्स और मिलावटी ज़हर पर निर्भर हो जाएगा, वह देश शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत कैसे बनेगा? यह सीधा-सीधा हमारे भविष्य की जड़ों में मट्ठा डालने जैसा है। इन ज़हर बेचने वाली फैक्ट्रियों और होटलों पर हत्या के प्रयास जैसे गंभीर मामले दर्ज होने चाहिए।
13. अनाज मंडियों की दर्दनाक दुर्दशा और खुले अनाज पर मंडराते आवारा कुत्ते: हमारे किसान खून-पसीना एक करके जो अनाज पैदा करते हैं, अनाज मंडियों में उसकी जो बेकदरी होती है, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्म की बात है। मंडियों में गेहूं और अन्य अनाजों के खुले ढेर लगे रहते हैं। उन ढेरों के ऊपर आवारा कुत्ते बैठे रहते हैं, वहीं सोते हैं, और उसी खुले अनाज पर शौच और मूत्र (Urinate) करते हैं। वह अनाज न तो कवर (Cover) किया जाता है और न ही उसकी कोई सुरक्षा होती है। यही दूषित अनाज बाद में पीसकर हमारे और आपके घरों की रसोइयों तक पहुँचता है। यह न केवल किसान की मेहनत का घोर अपमान है, बल्कि देश की करोड़ों जनता के स्वास्थ्य के साथ एक भयंकर और जानलेवा खिलवाड़ है। सिस्टम की यह लापरवाही अक्षम्य है।
14. अनाज भंडारण का अचूक और स्मार्ट समाधान (Vertical Storage Solution): मंडियों में अनाज को खुले में बर्बाद होने और जानवरों की गंदगी से बचाने के लिए हमारे पास एक बहुत ही व्यावहारिक, सस्ता और स्मार्ट 'वर्टिकल स्टोरेज' (Vertical Storage) समाधान मौजूद है। हमें लोहे के वर्टिकल वर्गाकार पाइप्स (Vertical iron square pipes) और हाई-क्वालिटी पॉलीबैग शीट्स (Poly bag sheets) का उपयोग करके 'टेंपरेरी कंटेनर' (Temporary Containers) बनाने चाहिए। इन कंटेनरों को मंडी में कहीं भी आसानी से खड़ा किया जा सकता है। इसमें अनाज नीचे से ऊपर की ओर भरा जाएगा, जिससे यह बहुत ही 'स्पेस-सेविंग' (Space saving) होगा यानी कम जगह में बहुत ज्यादा अनाज सुरक्षित रहेगा। इससे अनाज आवारा जानवरों की पहुँच से पूरी तरह दूर रहेगा, बारिश और नमी से बचेगा, और हमारा अन्न शत-प्रतिशत सुरक्षित रहेगा।
खंड 4: अतिक्रमण का कैंसर और सड़क सुरक्षा के कड़े नियम
15. गोचर भूमि, तालाब और शामलात पर कब्जों का महा-संकट: आज हमारे गाँवों और कस्बों में पर्यावरण और ग्राम-समाज की जीवनरेखा मानी जाने वाली जमीनों को भू-माफियाओं और दबंगों ने निगल लिया है। गो-वंश के चरने के लिए छोड़ी गई 'गोचर भूमि', पंचायतों की शामलात जमीनें, फिरनी और प्राचीन तालाबों पर अवैध कब्जों की बाढ़ आ गई है। इन कब्जों के कारण आज हमारे बच्चों के पास खेलने के लिए न तो कोई प्लेग्राउंड (Playground) बचा है, और न ही गाँवों में कचरा प्रबंधन (Dumping ground) के लिए कोई जगह बची है। गो-वंश आज सड़कों पर प्लास्टिक खाने को मजबूर है। इन सभी अवैध कब्जों पर युद्धस्तर (War-footing) पर कार्रवाई की सख्त आवश्यकता है। प्रशासन को बुलडोज़र चलाकर एक-एक इंच गोचर और पंचायत भूमि को तुरंत मुक्त कराना चाहिए।
16. सड़क किनारे की अवैध झुग्गियां, भिक्षावृत्ति और ट्रैफिक का ठहराव: सड़कों और हाईवे के किनारे पनपने वाली अवैध झुग्गियां और बस्तियां न केवल शहरों की सुंदरता को बर्बाद करती हैं, बल्कि ये गंभीर सामाजिक और ट्रैफ़िक समस्याएं भी पैदा करती हैं। इन झुग्गियों में रहने वाले लोगों के पास परिवार नियोजन का कोई साधन या इच्छा नहीं होती, जिसके कारण इनके बच्चों की संख्या बहुत ज्यादा होती है। ये मासूम बच्चे सड़कों पर भिक्षावृत्ति (Begging) करने को मजबूर होते हैं, और अचानक सड़क पर आ जाने के कारण छोटे-बड़े ट्रैफ़िक को बुरी तरह बाधित करते हैं, जिससे रोज़ भयानक हादसे होते हैं। सड़क सुरक्षा के 'बेसिक रूल्स' (Basic Rules) का बहुत सख्ती से पालन होना चाहिए और सड़क किनारे किसी भी प्रकार के अवैध निर्माण या झुग्गियों को पनपने की शून्य अनुमति (Zero tolerance) होनी चाहिए।
खंड 5: राष्ट्र-द्रोह, ओछी राजनीति और चाणक्य नीति का प्रहार
17. राजनीतिक विपक्ष का गैर-जिम्मेदाराना रवैया और देश की संपत्ति का नुकसान: लोकतंत्र में राजनीति और वैचारिक मतभेद होना एक स्वस्थ परंपरा है। आप सरकार की नीतियों के घोर विरोधी हो सकते हैं, आप तीखी जुबानी जंग कर सकते हैं, लेकिन 'राजनीतिक विरोध' के नाम पर 'देश-विरोध' किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। आज जब विपक्ष या कुछ नेता अपनी गैर-जिम्मेदारी और लापरवाही से 'देश की आत्मा' को ठेस पहुंचाते हैं, दंगे भड़काकर सार्वजनिक और राष्ट्रीय संपत्तियों (बसों, ट्रेनों) को आग के हवाले करते हैं, और देश-विरोधी ताकतों को खुला समर्थन देते हैं, तो यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि राष्ट्र-द्रोह है। देश की संपत्ति और अखंडता को नुकसान पहुंचाने वाली ऐसी ओछी राजनीति इस नए भारत में बिल्कुल नहीं चल सकती।
18. राष्ट्र-द्रोहियों के खिलाफ 'साम-दाम-दंड-भेद' की चाणक्य नीति: जो लोग देश के भीतर रहकर देश को ही खोखला करने का प्रयास कर रहे हैं, उनके साथ सामान्य अपराधियों जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता। महान कूटनीतिज्ञ आचार्य चाणक्य ने कहा था कि राष्ट्र की रक्षा सर्वोपरि है। यदि कोई व्यक्ति, संस्था या राजनीतिक दल देश को नुकसान पहुंचाता है, तो उसे सुधारने या खत्म करने के लिए 'साम, दाम, दंड, भेद'—हर प्रकार की चाणक्य नीति का निर्दयता से प्रयोग किया जाना चाहिए। राष्ट्र की सुरक्षा के मामले में कोई भी नरमी या मानवाधिकार का झूठा विलाप देश के लिए आत्मघाती साबित होता है।
19. राष्ट्र की सुरक्षा 'धीमे' कानूनों से बहुत ऊपर है (Zero Compromise): कई बार यह तर्क दिया जाता है कि हमें हर हाल में कानूनी प्रक्रिया (Legal process) का ही पालन करना चाहिए। लेकिन सच्चाई यह है कि हमारे देश का कानून बहुत धीमा है; यहाँ अदालतों में फैसले आने में कई-कई साल, बल्कि दशक लग जाते हैं। जब बात राष्ट्रीय सुरक्षा और देश-विरोधी ताकतों से निपटने की हो, तो यह 'समय की बर्बादी' देश के लिए एक बहुत बड़ा नुकसान बन सकती है। क्योंकि देश-विरोधी ताकतें और आतंकवादी भारत को नुकसान पहुंचाने के लिए किसी 'कानून या नियम' का पालन नहीं करते। वे नियमों से आगे बढ़कर हम पर वार करते हैं। इसलिए, हमें भी उनसे दो कदम आगे रहकर, नियम-कानून से ऊपर उठकर सबसे पहले देश की रक्षा करनी होगी।
20. 'यदि राष्ट्र सुरक्षित है, तभी संविधान और कानून सुरक्षित हैं': हमें यह परम सत्य समझना होगा कि कानून, अदालतें और नियम तभी तक अस्तित्व में हैं, जब तक यह 'राष्ट्र' अस्तित्व में है। यदि देश ही सुरक्षित नहीं रहेगा, तो न कोई कानून बचेगा और न कोई अधिकार। इसलिए, यदि देश-विरोधी ताकतों और आतंकवाद के खिलाफ समय रहते 'आउट-ऑफ-द-बॉक्स' (कठोर और असाधारण) कदम उठाने पड़ें—भले ही वह सामान्य कानूनी प्रक्रिया से बाहर की बात लगे—तो भी राष्ट्रहित में वह कदम बिना किसी हिचकिचाहट के उठाया जाना चाहिए। हमें वह सब करना होगा जिससे भारत सुरक्षित रहे, क्योंकि यदि भारत मजबूत और सुरक्षित है, तो हमारे नियम, हमारा संविधान और हमारा लोकतंत्र अपने आप सुरक्षित रहेगा।
नया भारत: एक सभ्यता का पुनर्जागरण (भाग - 3)
(जवाबदेही, डिजिटल शुद्धिकरण और 'सोने की चिड़िया' के पुनर्जन्म का महासंकल्प)
खंड 6: डिजिटल व्यवस्था के लूपहोल, टेस्टिंग और विभागों की 'जवाबदेही'
21. यूपीआई (UPI) की शक्ति और 'कैश-फ्लो' के भ्रष्ट लूपहोल (Loopholes): यूपीआई और डिजिटलाइजेशन निस्संदेह भारत के सबसे मजबूत और क्रांतिकारी हथियार हैं। लेकिन व्यवस्था की कड़वी सच्चाई यह है कि इस मजबूत टूल (Tool) का उपयोग देश के हर सरकारी विभाग में आज भी पूरी ईमानदारी और शत-प्रतिशत क्षमता के साथ नहीं किया जा रहा है। सिस्टम में बैठे कुछ भ्रष्ट लोग जानबूझकर व्यवस्था में 'लूपहोल' (Loopholes) और कमियां बनाए रखने की निरंतर कोशिश करते हैं, ताकि सिस्टम में 'कैश फ्लो' (Cash flow) और नकद लेन-देन का रास्ता खुला रहे। वे अच्छी तरह जानते हैं कि अगर पूरा सिस्टम 100% डिजिटल और पारदर्शी हो गया, तो उनका काला धन और रिश्वतखोरी का धंधा पूरी तरह बंद हो जाएगा। जहाँ नकद लेन-देन (Cash flow) होता है, वहाँ भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी की संभावनाएं सबसे अधिक पनपती हैं। इस 'घुन' को मारने के लिए सरकार को नकद लेन-देन पर सख्त लगाम कसते हुए हर विभाग को अनिवार्य रूप से 100% डिजिटल ट्रैकिंग के दायरे में लाना ही होगा।
22. बिना नेशनल टेस्टिंग के योजनाएं थोपना और 'यूज़ एंड अर्निंग' (Use and Earn) का सुझाव: भारत में अक्सर सरकारी विभाग नई डिजिटल सेवाएं या ऐप्स आधी-अधूरी तैयारी के साथ सीधे जनता पर थोप देते हैं, जिससे जनता का पैसा और समय दोनों बर्बाद होते हैं। किसी भी नई सरकारी डिजिटल सर्विस को लॉन्च करने से पहले उसकी सख्त 'नेशनल लेवल टेस्टिंग' (National Level Testing) होनी चाहिए। इसके लिए एक स्मार्ट रणनीति अपनाई जा सकती है—लॉन्च से पहले आम नागरिकों को आधार (Aadhaar) बेस पर इन सेवाओं का हेवी यूज़ (Heavy use) करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। उन्हें 'यूज़ एंड अर्निंग' (Use and Earning) मॉडल के तहत रिवॉर्ड दिए जाएं ताकि लाखों लोग एक साथ उस सिस्टम को टेस्ट करें। जब सिस्टम पर भारी ट्रैफिक आएगा, तो लॉन्च होने से पहले ही उसकी सारी संभावित कमियां (Bugs/Issues) और लूपहोल्स पकड़ में आ जाएंगे। इससे लॉन्च के बाद जनता को परेशान नहीं होना पड़ेगा और सर्विस 'सुपरफास्ट' काम करेगी।
23. सरकारी विभागों की लापरवाही पर 'उपभोक्ता को हर्जाना' (Accountability and Compensation): जब कोई उपभोक्ता निजी (Private) कंपनी को पैसे देता है, तो उसे तेज और स्थिर सर्विस मिलती है। लेकिन सरकारी विभागों में सब उलटा है। सरकार या विभाग की किसी भी देरी, लापरवाही या तकनीकी खामी के कारण यदि आम उपभोक्ता का नुकसान होता है, तो उसका हर्जाना (Compensation) अनिवार्य रूप से विभाग को भरना चाहिए। उदाहरण के लिए, बिजली बोर्ड (Electricity Board) के सिस्टम में बार-बार स्पार्किंग, वोल्टेज का भारी उतार-चढ़ाव, 'डबल फेस' (Double phase) आना या 'न्यूट्रल ब्रेक' (Neutral break) जैसी गंभीर समस्याएं होती हैं। उपभोक्ता लगातार शिकायत करता रहता है, पर कोई सुनवाई नहीं होती। इस फाल्ट के कारण गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों के फ्रिज, टीवी, एसी और अन्य महंगे उपकरण जलकर खाक हो जाते हैं। लेकिन बिजली बोर्ड कभी उस नुकसान की भरपाई नहीं करता। यह गुंडागर्दी बंद होनी चाहिए। सरकारी लापरवाही से हुए एक-एक रुपये के नुकसान की भरपाई सीधा उपभोक्ता के खाते में होनी चाहिए, तभी विभागों की नींद टूटेगी।
24. शिक्षा, स्वास्थ्य और फायर सेफ्टी: कागजी नियमों और जमीनी हकीकत का फासला: देश के स्वास्थ्य विभाग (Health Department), फायर ब्रिगेड और लिफ्ट इंस्पेक्शन विभागों में जो नियम कागजों पर दर्ज हैं, व्यावहारिक (Practical) रूप से उनका कहीं कोई अता-पता नहीं है। ऊंची इमारतों की लिफ्ट का इंस्पेक्शन और होटलों/अस्पतालों की फायर सेफ्टी का सर्टिफिकेट केवल 'फर्जी' तरीके से कार्यालयों में बैठकर बांट दिया जाता है। जब कोई भयंकर अग्निकांड होता है या लिफ्ट गिरती है, तब जाकर फाइलें खुलती हैं। इसी तरह शिक्षा का हाल है; सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की सैलरी प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों की तुलना में 5 से 6 गुना अधिक होती है। इसके बावजूद उनका रिज़ल्ट (Result) और आउटपुट कभी प्राइवेट स्कूलों जैसा क्यों नहीं आता? क्योंकि सरकारी पैसे का सही 'आउटपुट' लेने का कोई सख्त पैमाना नहीं है। कम पैसे में प्राइवेट सेक्टर ज्यादा आउटपुट देता है, क्योंकि वहाँ जवाबदेही है। सरकारी क्षेत्र में भी 'काम नहीं तो वेतन नहीं' और 'आउटपुट आधारित मूल्यांकन' (Performance-based output) सख्ती से लागू होना चाहिए।
खंड 7: 'द अल्टीमेट ग्रैंड क्लाइमैक्स' (सर्वोच्च संकल्प और राष्ट्र-पुनर्जागरण)
25. व्यवस्था की 'घुन' का समूल नाश और राष्ट्र प्रथम की नीति: चाहे वह बिना तालमेल के बार-बार खोदी जाने वाली सड़कें हों, खाने में ज़हर परोसने वाली फैक्ट्रियां हों, मंडियों में अनाज पर मंडराते कुत्ते हों, या राजनीति की आड़ में देश-विरोधी ताकतों का समर्थन करने वाले जयचंद हों—ये सब हमारे राष्ट्र रूपी विशाल वृक्ष को अंदर ही अंदर खोखला करने वाली 'घुन' (दीमक) हैं। जैसे किसान अपनी फसल को बचाने के लिए खरपतवार को जड़ से उखाड़ फेंकता है, वैसे ही भारत को विश्वगुरु बनने के लिए अपनी व्यवस्था से इस दीमक को पूरी तरह जलाकर राख करना होगा। हमें ऐसे कठोर, पारदर्शी और जवाबदेह तंत्र की स्थापना करनी होगी, जहाँ कोई भी अधिकारी, नेता या नागरिक अपनी जिम्मेदारी से भाग न सके। राष्ट्र की सुरक्षा और समृद्धि किसी भी धीमे कानून, राजनीतिक स्वार्थ या भ्रष्ट कार्य-संस्कृति से बहुत ऊपर है। भारत को अब 'जुगाड़' और 'चलता है' की मानसिकता को हमेशा के लिए दफन करना होगा।
26. महा-संकल्पना: "सिर्फ एक साल... देश के नाम" (The One Year Resolution): इतनी सारी समस्याओं, भ्रष्टाचार और अव्यवस्था के इस अंधकार को कैसे मिटाया जाए? इसका केवल एक ही अचूक और ब्रह्मास्त्र समाधान है—हमारे अंतर्मन का पूर्ण जागरण! एक क्षण के लिए अपनी आँखें बंद कीजिए और कल्पना कीजिए… अगर इस पूरी व्यवस्था से जुड़े लोग, सत्ता के शीर्ष पर बैठे अधिकारी, सरकारी दफ्तरों के कर्मचारी, सीमा पर खड़े जवान, खेतों में पसीना बहाते किसान और इस देश का हर एक आम ज़िम्मेदार नागरिक… सिर्फ और सिर्फ 'एक साल' के लिए एक महा-संकल्प ले ले! एक ऐसा संकल्प जहाँ हम इस राष्ट्र से कुछ 'मांगने' या शिकायत करने के बजाय, अपना सर्वस्व इस देश को 'देने' के लिए जिएं! बिना किसी स्वार्थ के, बिना किसी चोरी के, अपनी 100% निष्ठा, 100% ईमानदारी और अपनी 100% क्षमता के साथ केवल अपनी मातृभूमि के लिए कर्म करें।
27. परिणामों की गवाही: "काम खुद शोर मचाएगा" (The Roar of Results): मेरा यह अत्यंत दृढ़ और अटल विश्वास है कि यदि 140 करोड़ भारतीयों की यह निष्ठा, यह ईमानदारी और यह सामूहिक ऊर्जा एक दिशा में लग जाए, तो दुनिया की कोई भी ताकत, कोई भी विश्व-शक्ति और कोई भी षड्यंत्र हमारे किसी भी कार्य को अधूरा नहीं रख सकता। तब हमें अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। जब तमिलनाडु का ट्रक खाली वापस न लौटकर देश का ईंधन बचाएगा, जब हर गाँव का गोबर बायोगैस बनकर ट्रैक्टर दौड़ाएगा, और जब भ्रष्टाचार की लीकेज शून्य हो जाएगी... तो परिणामों की गारंटी कोई और नहीं, बल्कि खुद यह भारत देगा! तब हमारे परिणाम खुद इतनी ज़ोर से शोर मचाएंगे कि उसकी गूंज पूरी दुनिया के कानों के पर्दे फाड़ देगी।
28. आत्मनिर्भर गाँव और स्मार्ट शहरों का अभ्युदय: और जिस दिन भारत का वह उन्नत गाँव अपनी पूरी आर्थिक, प्राकृतिक और तकनीकी शक्ति के साथ खड़ा हो गया... जहाँ कुपोषण का नामोनिशान न हो, जहाँ का लिवर प्राकृतिक घी और जैविक अन्न से पुष्ट हो, और जहाँ के तालाब स्वच्छ जल से लबालब भरे हों! और जिस दिन भारत के स्मार्ट शहर अपने प्लास्टिक कचरे को ईंधन में बदलकर और सूर्य की ऊर्जा से खुद को रोशन कर आत्मनिर्भर हो गए... उस दिन देश का यह भौतिक और आध्यात्मिक कायाकल्प मानव इतिहास का सबसे बड़ा चमत्कार होगा। हमारी सेनाएं सीमाओं पर अजेय होंगी, और हमारे मंदिर हमारी आत्मा को रोशन कर रहे होंगे।
29. 'सोने की चिड़िया' का पुनर्जन्म (Rebirth of the Golden Bird): यह 'नया भारत' केवल कंक्रीट के हाईवे, बुलेट ट्रेनों या डिजिटल ऐप्स तक सीमित नहीं होगा। यह एक ऐसी सभ्यता का पुनर्जागरण होगा जिसने अपने अस्तित्व की सबसे लंबी और कठिन लड़ाई जीती है। यह भारत दुनिया की आंख में आंख डालकर बात करेगा, न किसी को डराएगा और न किसी से डरेगा। उस दिन यह संपूर्ण विश्व, जो कल तक हमें एक गरीब और सपेरों का देश समझता था, नतमस्तक होकर एक बार फिर से इस महान राष्ट्र को 'सोने की चिड़िया' (The Golden Bird) और 'विश्वगुरु' कहते हुए दिखाई देगा।
30. अंतिम प्रहार (The Final Conclusion): यह केवल एक विचार नहीं, हमारे अस्तित्व की अंतिम पुकार है। समय आ गया है कि हम 'उपभोक्ता' की मानसिकता को त्याग कर इस महान राष्ट्र के 'निर्माता' (Creator) बनें।
"सिर्फ विकास नहीं… प्रकृति, संस्कृति और आत्मनिर्भरता का नया भारत।"
"सिर्फ एक साल… देश के नाम।"
जय हिन्द। वन्दे मातरम्।
राष्ट्र-निर्माण के ब्लूप्रिंट को लिखते समय, मेरे हृदय में केवल और केवल अपनी मातृभूमि के प्रति असीम प्रेम, सुधार की तड़प और पूर्ण समर्पण की भावना रही है। एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में, व्यवस्था में लगी 'घुन' और ज़मीनी हकीकत को पूरी ईमानदारी से उजागर करने के लिए मुझे कुछ अत्यंत कड़वे, तीखे और कठोर शब्दों का प्रयोग करना पड़ा है।
यदि मेरे इन शब्दों, विचारों, किसी उदाहरण या किसी भी बिंदु से—जाने-अनजाने में—मेरे प्यारे देश की आत्मा, किसी संस्था, किसी विभाग या किसी भी व्यक्ति की भावनाओं को तनिक भी ठेस पहुंची हो, तो मैं दोनों हाथ जोड़कर, पूरे हृदय से क्षमा प्रार्थी हूँ।
मेरा उद्देश्य किसी का अपमान करना, किसी को नीचा दिखाना या किसी की भावनाओं को आहत करना बिल्कुल नहीं था। मेरा एकमात्र स्वार्थ, मेरा एकमात्र लक्ष्य और मेरी एकमात्र प्रार्थना यही है कि मैं अपने भारतवर्ष को एक अजेय, स्वच्छ, पारदर्शी और परम वैभवशाली 'सोने की चिड़िया' के रूप में पुनर्जन्म लेते हुए देख सकूं।
जय हिन्द। वन्दे मातरम्।
लेखक एवं प्रस्तुतकर्ता: रजिंदर सिंह (एक ज़िम्मेदार और राष्ट्र-प्रेमी नागरिक)

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