नया भारत: एक सभ्यता का पुनर्जागरण (भाग - 1) (परंपरा, प्रगति और व्यवस्था की 'घुन' को मिटाने का मास्टर ब्लूप्रिंट) खंड 1: 'घुन' की पहचान - बीमारी का सही समय पर इलाज 1. पल्लू और पहिए का सटीक उदाहरण: हमारे समाज में एक बहुत सामान्य लेकिन गहरी बात कही जाती है—जब कोई महिला बाइक पर बैठती है, तो हर कोई उसे टोकता है कि "बहन, अपना पल्लू संभाल लो, कहीं पहिए में न फंस जाए।" यह क्या है? यह दुर्घटना होने से पहले खतरे को भांपकर उसे रोकने की एक समझ है। लेकिन दुर्भाग्य से, जब बात हमारे देश की प्रशासनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय संपदा की आती है, तो हम यह 'पल्लू' पहिए में फंसने देते हैं। हम तब तक इंतज़ार करते हैं जब तक दुर्घटना न हो जाए। एक राष्ट्र के रूप में हमें यह सीखना होगा कि खतरे, लापरवाही और 'घुन' (दीमक) को समय रहते पहचान कर उसका इलाज करना ही विकास की पहली शर्त है। बिना इस पहचान के, कोई भी विकास टिक नहीं सकता। 2. खरपतवार और किसान की समझ: एक सच्चा किसान जानता है कि अगर फसल में खरपतवार (Weeds) उग आए हैं, तो उसे शुरुआती दौर में ही उखाड़ फेंकना चाहिए। यदि किसान यह ...
(भाग - 1) (परंपरा, प्रगति और व्यवस्था की 'घुन' को मिटाने का मास्टर ब्लूप्रिंट) खंड 1: सभ्यता का स्वर्णिम अतीत और व्यवस्था में 'घुन' (दीमक) की पहचान 1. सभ्यता का शाश्वत अस्तित्व और 'सोने की चिड़िया' का स्वर्णिम युग: भारत को केवल दुनिया के नक्शे पर खींची गई कुछ राजनीतिक रेखाओं या एक निर्जीव भौगोलिक भूखंड के रूप में देखना इस महान भूमि के साथ सबसे बड़ा अन्याय होगा। यह देश हज़ारों वर्षों से निरंतर स्पंदित होने वाली, सांस लेने वाली और पूरे विश्व को ज्ञान की दिशा दिखाने वाली एक जीवंत सभ्यता है। इतिहास में एक ऐसा स्वर्णिम और गौरवशाली कालखंड था, जब हमारे पूर्वजों के उच्च कोटि के ज्ञान, उन्नत व्यापार, उत्कृष्ट कृषि-प्रणालियों और असीम आध्यात्मिक चेतना के कारण इस भूमि को पूरे विश्व में पूर्ण सम्मान के साथ 'सोने की चिड़िया' कहा जाता था। हमारे प्राचीन विश्वविद्यालयों में दुनिया भर से विद्यार्थी ज्ञान अर्जन के लिए आते थे, और हमारे समुद्री जहाज़ दुनिया के हर कोने तक भारतीय मसालों, सूती वस्त्रों और दर्शन का स्वतंत्र व्यापार करते थे। यह वह दौर था जब मानवीय मूल्यों और भौ...